मौसम-ए-गुल में धनक रंग फ़ज़ाएँ देखूँ
घिर के आई तेरी यादों की घटाएँ देखूँ
मय-कशी छूट गई मुद्दतें गुज़रीं यारो
सामने आती नई रोज़ बलाएँ देखूँ
लड़खड़ाती हुई साँसों में तरन्नुम डूबा
हाथ मलती हुई देरीना सदाएँ देखूँ
मुझको देना न मुआफ़ी मैं तेरी मुजरिम हूँ
चाह देखूँ तिरी जो अपनी ख़ताएँ देखूँ
एक कमरे में फ़क़त मैं मेरी तन्हाई है
सहन में निकलूँ तो सदरंग हवाएँ देखूँ
मुझको भी जादू-बयानी का हुनर आता था
अब जो देखूँ तो 'सबा' सिर्फ़ सजाएँ देखूँ
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