आँसू हैं बेकसी है मुसीबत है क्या करें

कमबख़्त दिल को आप की चाहत है क्या करें

दिल की लगी ने होश से बेगाना कर दिया
तुम को तो दिल-लगी है शरारत है क्या करें

क्या बे-ज़बान हैं कि शिकायत न कर सकें
यूँ कहिए ये हमारी शराफ़त है क्या करें

तुम बे-नियाज़ चल दिए जैसे ग़रज़ नहीं
वो लोग जिन को तुम से मुहब्बत है क्या करें

याद-ए-हबीब याद-ए-ख़ुदा याद-ए-आरज़ू
इक दिल है उस पे ऐसी क़यामत है क्या करें

राह-ए-वफ़ा में ख़्वार-ओ-परेशाँ हुई 'सबा'
बस वो है और कू-ए-मलामत है क्या करें

— divya 'sabaa'

More by divya 'sabaa'

Other ghazal from the same pen

See all from divya 'sabaa' →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling