जो मेरा रुख़-ए-नूर-फ़िशाँ देख रहा है
वो बज़्म-ए-गुल-ओ-लाला कहाँ देख रहा है
वो देख रहा है मिरे जल्वों की बहारें
आलम तो फ़क़त बाग़-ए-जिनाँ देख रहा है
इक उसके सिवा सबकी हैं आईने पे नज़रें
आईना ये शोख़ी से कहाँ देख रहा है
शोख़ी पे उतर आई हैं फूलों की निगाहें
और एक वो क्या जाने कहाँ देख रहा है
क्यूँँ जान मिरे तन से निकलने को है बेताब
कातिल तो अभी तीर-ओ-कमाँ देख रहा है
शायद ये मिरे हुस्न की है आतिश-ए-सोज़ाँ
उठ्ठा है कहाँ से वो धुआँ देख रहा है
आता ही नहीं उसको यक़ीं दिल की तड़प का
वो हँस के मिरी आह-ओ-फ़ुग़ाँ देख रहा है
ये सब है 'सबा' उसके लिए एक तमाशा
वो मेरा यक़ीं मेरा गुमाँ देख रहा है
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