उसने बिगड़ के मुझ से कहा बात बात में
रोते नहीं यूँँ अहल-ए-वफ़ा बात बात में
कुछ बात थी जो उस की ज़बाँ कह नहीं सकी
कुछ सोच सोच कर वो रुका बात बात में
उस की भी चश्म नम हुई दौरान-ए-गुफ़्तगू
याद आ गया मुझे भी ख़ुदा बात बात में
जब इल्म से कमाल दिखाया ब-फ़ैज़-ए-इश्क़
फिर ज़िन्दगी का राज़ खुला बात बात में
मंज़र न घर न राह न मंज़िल न राहतें
सब कुछ किसी ने छीन लिया बात बात में
इतने ख़याल हैं कि मेरे सर पे धूप थी
जाने कब आफ़ताब ढला बात बात में
यूँँ तो इधर उधर की ही बातें बनाता है
पर लेता है वो नाम सबा बात बात में
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