"रात की बोझिल उदासी"

रात की बोझिल उदासी और याद-ए-रफ़्तगाँ
बुझ रहे हैं चाँद-तारे जल रहे हैं जिस्म-ओ-जाँ
बहर-ओ-बर पर छा रहा है नम अँधेरों का धुआँ

सीना-ए-दरिया पहाड़ों के नगर सोए हुए
दश्त के पहलू में दीवानों के घर सोए हुए
साया-ए-ज़ुल्मत तले उजड़े बशर सोए हुए

खो गई तारीकियों में सोच की गहराइयाँ
ज़ेहन-ओ-दिल को घेरती हैं यास की परछाइयाँ
जाने किस दुनिया में जा कर बस गई रानाइयाँ

ज़िंदगी का मान किस ने रख दिया बज़्म-ए-चमन
ज़िंदगी तो है किसी बदबख़्त राही की थकन
आरज़ूओं की समाधी सर्द सीने की घुटन

हो चला है दिल मेरा ना-आश्ना-ए-रंग-ओ-नूर
हो गया है आज वो दुनिया की हर राहत से दूर
फ़िक्र के ज़िंदाँ में लेकिन सर पटकता है शऊर

चीख़ती है रूह मेरी आज भी मुझ से परे
जैसे मीलों दूर जंगल से कोई आवाज़ दे
जैसे बूढ़ा साँप हो बेताब उड़ने के लिए

— divya 'sabaa'

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