आलाम-ए-सफ़र याद न गुज़री जो बला याद
हम अहल-ए-वफ़ा को रही बस राह-ए-वफ़ा याद
अब तो नहीं आती कोई आवाज़ कहीं से
अब तो नहीं दिल को भी धड़कने की सदा याद
आईना-ए-अय्याम तो शफ़्फ़ाफ़ है लेकिन
इतना कि हमें अपना ही चेहरा न रहा याद
ऐ दश्त-ए-जुनूँ किसने तुझे बाग़ बनाया
क्या तुझको नहीं क़ैस का शिकवा-ओ-गिला याद
क्या जानिए मिज़गाँ पे 'सबा' है ये नमी क्यूँँ
आँखों को नहीं कुछ भी छलकने के सिवा याद
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