kis se kahiye ki saba le ke ghubaar aati hai | किस से कहिए कि सबा ले के ग़ुबार आती है

  - divya 'sabaa'

किस से कहिए कि सबा ले के ग़ुबार आती है
हम ने जाना ही नहीं कैसे बहार आती है

दिन निकलते ही निकल जाते हैं दफ़्तर के लिए
शाम होती है परिंदों की क़तार आती है

पाँव टिकता ही नहीं अम्न की शहज़ादी का
वो तो जब आती है घोड़े पे सवार आती है

चुप खड़ी रहती है मायूस उदासी इस पार
नाव उम्मीद की उस पार उतार आती है

नक़द-ए-जाँ लूटने वालों ने उसे बख़्श दिया
उस घराने में तो हर साँस उधार आती है

काँपने लगती है ज़ैतून की डाली-डाली
फ़ाख्ता लौट के जब सीना फ़िगार आती है

आओ ग़ालिब की तरह आग से गुज़रें कि 'सबा'
शे'र तर होते हैं अल्फ़ाज़ पे धार आती है

  - divya 'sabaa'

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