divya 'sabaa'

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    चंद मख़्सूस दरख़्तों से मुहब्बत का जुनून
    कुछ परिंदों को कहीं का नहीं रहने देता

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    हमने ग़ज़ल में उसके सिवा सबसे बात की
    अब इसको आप कुछ भी कहें इस्तिलाह में

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    उस से बे-दर्दी का शिकवा ठीक नहीं है
    हम भी उससे कौन सा बे-मतलब मिलते हैं

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    नक़्श-ए-जाँ हो गई तहरीर शिकस्त-ए-उल्फ़त
    किस तरह वो मिरे माथे की शिकन को भूले

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    कोई राजा हो इक दिन राजधानी छूट जाती है
    सिकन्दर आते जाते हैं कहानी छूट जाती है

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    फिर वही होगी मुहब्बत और वही तर्ज़-ए-ख़ुलूस
    अपने ज़ेहनों से तसव्वुर को जुदा तो कीजिए

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    घर लौट के जाने के ख़यालात लिए वो
    ख़्वाबों में भी मिलते हैं शिकायात लिए वो

    ज़ख़्मों की हर इक टीस पे रुक जाते हुए हम
    तारों की गुज़रती हुई बारात लिए वो

    इस शोर-शराबे में चले आएँ कभी तो
    परियों की तरह नींद के नग़्मात लिए वो

    किस सोच में उलझन में खड़े हैं मेरे नज़दीक
    होंठों पे मुहब्बत की दबी बात लिए वो

    इनकार की आँखों से झलकता हुआ इक़रार
    इक लुत्फ़ में सौ लुत्फ़-ए-इनायात लिए वो

    माथे पे जलाए हुए इक सुब्ह की क़िंदील
    घनघोर खुली ज़ुल्फ़ों में इक रात लिए वो

    सुध भूले कँवल नैनों में वो नींद के झोंके
    सो जाते सबा हाथों में यूँ हाथ लिए वो

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    न आसमाँ पे सितारे न माहताब न तुम
    करेगा क्या कोई इन बे-क़रार रातों का

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    सुकून जिस में मयस्सर नहीं है इक पल भी
    हयात है मगर उसको हयात क्या लिखना

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    इन्हीं ख़्वाबों पे ख़ुश होना इन्हीं ख़्वाबों से डर जाना
    तमाशा बन गया इनके लिए अपना तो मर जाना

    सिखाया था तुम्हीं ने आरज़ू को दर-ब-दर फिरना
    तुम्हीं ने ज़िंदगी को इस क़दर क्यूँ मुख़्तसर जाना

    कई दिन से हमें ये काम भी रास आ गया या रब
    सवेरे को सिमटना रात को फिर से बिखर जाना

    अभी तक है ख़यालों में वही तस्वीर ग़म उसका
    बहुत मासूम पलकों पर समंदर का ठहर जाना

    भरे बैठे थे फिर भी हम न रोए ख़ुद-फ़रेबी पर
    तिरी मंज़िल को हमने अजनबी की रहगुज़र जाना

    बड़ी ही क़ीमती शय थी नज़र अपनी ज़माने में
    इसी को जाम-ए-जम समझे इसी को मोतबर जाना

    जो हम देखें तिरी जानिब तो तेरा रुख़ बदल जाए
    इसी गर्दिश को हमने गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर जाना

    'सबा' की रहगुज़र पर इक सहर ख़ुशबू चली ऐसे
    मुसाफ़त कम रही लेकिन बहुत लम्बा सफ़र जाना

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