ऐसे खंडहर को कौन देखे है
    घर से निकलो तो सज सँवर के चलो
    Moni Gopal Tapish
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    तू समझ सके कभी मुझको मेरी निगाह से, कभी यूँ भी हो
    कि ये ख़्वाब था मेरी आँख में, गई रात चुपके से मर गया
    Moni Gopal Tapish
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    एक ग़ज़ल फिर कहना चाहूँ तेरे-मेरे प्यार के नाम
    आधा तेरी जीत का क़िस्सा आधा मेरी हार के नाम

    इश्क़ मुहब्बत के अफ़साने,रांझा ,मजनूँ या फ़रहाद
    सब गुल बूटे ख़ुशबू वाले लेकिन हैं तलवार के नाम
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    Moni Gopal Tapish
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    नीम बिस्मिल हवा आरज़ी तौर पर साँस लेती रही
    सांँवला एक मौसम दरख़्तों की शाख़ों पे रक्खा रहा
    Moni Gopal Tapish
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    ग़मों की भीड़ दर्दों की निगहबानी में रहना है
    बता ऐ ज़िन्दगी कब तक परेशानी में रहना है

    वो अपने कौ़ल से वापस पलट जाए उसे हक़ है
    'तपिश' हमको तो अपनी बात के पानी में रहना है
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    Moni Gopal Tapish
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    तू कि रौशन दिये की महक की तरह,सर्द रातों के दिल में
    लहकता हुआ

    मैं कि सूरज का टुकड़ा मगर बुझ गया, शाम के दर पे आखि़र सिसकता हुआ
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    Moni Gopal Tapish
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    इसी सबब से कभी आँख भर नहीं रोए
    तुझे भुलाया ही कब था जो याद करते हम
    Moni Gopal Tapish
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    रात फिर आँखों की धरती देर तक जलती रही
    देर तक अश्कों का सावन टूट कर बरसा किया
    Moni Gopal Tapish
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    कुछ पल हमने साथ बिताए एक डगर पर
    ये क़िस्सा दरियाओं को तुग़्यानी देगा

    हम महफ़िल महफ़िल सजने वाले मौसम हैं
    कौन बता ऐ तपिश हमें वीरानी देगा
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    Moni Gopal Tapish
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    सबको अपना इश्क़ बताना रोना-धोना चिल्लाना
    जो जी चाहे कर सकता है वो अपनी नादानी में

    अश्कों की अपनी बोली है ख़ामोशी की कहन जुदा
    कुछ तस्वीरें आख़िर आग लगा देती हैं पानी में
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    Moni Gopal Tapish
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