मुलाक़ात का सिलसिला हो गया
जो था अजनबी आश्ना हो गया
तुम्हें देख कर देखती रह गई
निगाहों को मेरी ये क्या हो गया
वो इक शख़्स दिल जिसका ज़ख़्मी हुआ
चलो दर्दस आश्ना हो गया
कोई आँख फिर आज पुरनम हुई
किसी से कोई फिर जुदा हो गया
कभी जाम उसको मिलेगा नहीं
कोई सोचकर पारसा हो गया
ख़ताएँ जो उसने मेरी बख़्श दीं
गुनाहों का वो देवता हो गया
लबों पर 'सबा' मुस्कुराहट सी है
ग़म-ए-ज़िंदगी तुझको क्या हो गया
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