मुलाक़ात का सिलसिला हो गया
जो था अजनबी आश्ना हो गया
तुम्हें देख कर देखती रह गई
निगाहों को मेरी ये क्या हो गया
वो इक शख़्स दिल जिस का ज़ख़्मी हुआ
चलो दर्द से आश्ना हो गया
कोई आँख फिर आज पुरनम हुई
किसी से कोई फिर जुदा हो गया
कभी जाम उस को मिलेगा नहीं
कोई सोच कर पारसा हो गया
ख़ताएँ जो उस ने मेरी बख़्श दीं
गुनाहों का वो देवता हो गया
लबों पर 'सबा' मुस्कुराहट सी है
ग़म-ए-ज़िंदगी तुझ को क्या हो गया
— divya 'sabaa'















