थे ख़ास या कि आम मुझे देखते रहे

  - divya 'sabaa'

थे ख़ास या कि आम मुझे देखते रहे
छोटे बड़े तमाम मुझे देखते रहे

रिंदान-ए-मयकदे को ख़ुदा जाने क्या हुआ
रख कर ज़मीं पे जाम मुझे देखते रहे

इस कारवान-ए-शौक़ के रहबर कमाल थे
रुक रुक के गाम गाम मुझे देखते रहे

बाम-ए-फ़लक पे हाल फ़रिश्तों का था अजब
कर के दु'आ सलाम मुझे देखते रहे

मैं काफ़िर-ए-अज़ल थी मगर फिर भी अहल-ए-दीं
ले कर ख़ुदा का नाम मुझे देखते रहे

मंदिर में हर सनम की नज़र थी तो मुझ पे थी
मस्जिद में भी इमाम मुझे देखते रहे

सैयाद दम-ब-ख़ुद थे मिरे हाल-ए-ज़ार पर
झुक झुक के ज़ेर-ए-दाम मुझे देखते रहे

कल शब न जाने कौन मुझे ले गया कहाँ
ख़ूबाँ-ए-लाला-फ़ाम मुझे देखते रहे

दिन भर जो मुझ से आँख चुराते रहे 'सबा'
जी भर के सारी शाम मुझे देखते रहे

  - divya 'sabaa'

More by divya 'sabaa'

As you were reading Shayari by divya 'sabaa'

Similar Writers

our suggestion based on divya 'sabaa'

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari