jab bhi kuchh ilzaam mere sar lage | जब भी कुछ इल्ज़ाम मेरे सर लगे

  - divya 'sabaa'

जब भी कुछ इल्ज़ाम मेरे सर लगे
झूठी अफ़्वाहों को जैसे पर लगे

दो घड़ी आराम का हासिल न पूछ
काम जो मुश्किल थे मुश्किल-तर लगे

ताज़ा फूलों से नहीं घर की शिनाख़्त
फूल मुरझाएँ तो अपना घर लगे

अब ये नौबत आ गई है शहर में
आदमी को आदमी से डर लगे

दुख उठा के सब्र करना आ गया
बाज़ फल सूखे दरख़्तों पर लगे

झूठ का पर्दा ज़रा में फ़ाश हो
और सच कहने में सबको डर लगे

दिल में इक-इक लफ़्ज़ चुभता है 'सबा'
शे'र उसके मीर के नश्तर लगे

  - divya 'sabaa'

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