जब भी कुछ इल्ज़ाम मेरे सर लगे
झूठी अफ़्वाहों को जैसे पर लगे
दो घड़ी आराम का हासिल न पूछ
काम जो मुश्किल थे मुश्किल-तर लगे
ताज़ा फूलों से नहीं घर की शिनाख़्त
फूल मुरझाएँ तो अपना घर लगे
अब ये नौबत आ गई है शहर में
आदमी को आदमी से डर लगे
दुख उठा के सब्र करना आ गया
बाज़ फल सूखे दरख़्तों पर लगे
झूठ का पर्दा ज़रा में फ़ाश हो
और सच कहने में सबको डर लगे
दिल में इक-इक लफ़्ज़ चुभता है 'सबा'
शे'र उसके मीर के नश्तर लगे
As you were reading Shayari by divya 'sabaa'
our suggestion based on divya 'sabaa'
As you were reading undefined Shayari