वो शख़्स जिसे ग़म ने सँवारा नहीं होता

वैसा कोई तक़दीर का मारा नहीं होता

समझो कि वही अहल-ए-मुहब्बत के लिए है
जिस नाव की क़िस्मत में किनारा नहीं होता

रब मेरे गिरे बर्क़ तमन्ना-ए-अदू पर
वो ग़ैर का क्यूँ हो जो हमारा नहीं होता

मिलती है किसे मंज़िल-ए-मक़सूद जहाँ में
जब तक तिरी रहमत का इशारा नहीं होता

कब होता है मक़बूल कभी अहल-ए-नज़र में
जौहर जो तराशों से सँवारा नहीं जाता

गिनगिन के न दे जाम हमें साक़ी-ए-महफ़िल
दो-चार से अपना तो गुज़ारा नहीं होता

— divya 'sabaa'

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