वो शख़्स जिसे ग़म ने सँवारा नहीं होता
वैसा कोई तक़दीर का मारा नहीं होता
समझो कि वही अहल-ए-मुहब्बत के लिए है
जिस नाव की क़िस्मत में किनारा नहीं होता
रब मेरे गिरे बर्क़ तमन्ना-ए-अदू पर
वो ग़ैर का क्यूँ हो जो हमारा नहीं होता
मिलती है किसे मंज़िल-ए-मक़सूद जहाँ में
जब तक तिरी रहमत का इशारा नहीं होता
कब होता है मक़बूल कभी अहल-ए-नज़र में
जौहर जो तराशों से सँवारा नहीं जाता
गिनगिन के न दे जाम हमें साक़ी-ए-महफ़िल
दो-चार से अपना तो गुज़ारा नहीं होता
As you were reading Shayari by divya 'sabaa'
our suggestion based on divya 'sabaa'
As you were reading undefined Shayari