lahjaa hi talkh-talkh ibaarat men doob jaa.e | लहजा ही तल्ख़-तल्ख़ इबारत में डूब जाए

  - divya 'sabaa'

लहजा ही तल्ख़-तल्ख़ इबारत में डूब जाए
वो शाइरी न कर जो शिकायत में डूब जाए

यूँँ ज़िन्दगी का साज़ जराहत में डूब जाए
जैसे सदा-ए-अम्न बग़ावत में डूब जाए

रातों का कोई दोस्त न दिन का कोई रफ़ीक़
ग़म का ग़ुबार जिन की मुहब्बत में डूब जाए

दस्त-ए-सवाल होते हैं अब इस क़दर दराज़
हर शख़्स अपनी अपनी ज़रूरत में डूब जाए

ऐसी भी क्या हवस की हर इक रूप में ढलो
आईना जैसे अक्स की सूरत में डूब जाए

अन्दाज़-ए-शाइरी पे तुझे नाज़ है 'सबा'
लहजा मगर ग़ज़ल का रिवायत में डूब जाए

  - divya 'sabaa'

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