तिरी आँखों के ये काँसे बड़ी हैरत में डाले हैं
कभी दो-बाब लगते हैं कभी लगते पियाले हैं
न चश्म-ए-नम न कोई ग़म मैं बस ख़ामोश रहता हूँ
निराला 'इश्क़ है मेरा निराले मेरे नाले हैं
तिरे पैकर का इक साया हमेशा साथ रहता है
यही ग़म-ख़्वार है मेरा इसी ने ग़म सँभाले हैं
यूँँॅं ही कल ज़िक्र छेड़ा था किसी अग़्यार का उस ने
हम अपने ज़ेहन में तब से कई वहमों को पाले हैं
सो ये वाबस्तगी अपनी फ़क़त शाइस्तगी से है
हमारी ज़ात क्या हम तो मुहब्बत करने वाले हैं
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