कब से पड़ा हूँ दर पे तिरे मेरे यार देख
तू मुझ को बारहा न सही एक बार देख
जानाँ तिरी सितमगरी का हश्र ये हुआ
बर्बाद हो गया है तिरा शहरयार देख
तेरे फ़िराक़ में न हुआ पस्त-हौसला
तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख
रोते नहीं हैं मर्द ये किस ने तुझे कहा
अंदर से रो रहे हैं सभी ज़ार-ज़ार देख
हमदम मिरे तू अब तो यहाँ दिल की बात कर
माहौल कर दिया है तिरे साज़गार देख
As you were reading Shayari by 'June' Sahab Barelvi
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