मैं वो ज़िया भी किसी काम लाया करता था

  - Kabir Athar

मैं वो ज़िया भी किसी काम लाया करता था
जिसे चराग़ धुएँ में उड़ाया करता था

और अब तो मैं भी सर-ए-राह फेंक देता हूँ
कभी मैं फूल नदी में बहाएा करता था

कहीं मैं देर से पहुँचूँ तो याद आता है
कहीं मैं वक़्त से पहले भी जाया करता था

बस इतना दख़्ल था मेरा ख़ुदा के कामों में
मैं मरते लोगों की जाने बचाया करता था

मेरे सुपुर्द किफ़ालत थी बे-ज़ुबानों की
मैं रिज़्क़ इसलिए वाफ़िर कमाया करता था

ये ख़ुद मुझे भी बड़ी देर में हुआ मालूम
कि कोई दुख मुझे अंदर से खाया करता था

चराग़ इसलिए सुनते थे ग़ौर से मुझ को
मैं रौशनी को सलीक़े से गाया करता था

मैं उस के 'इश्क़ में पागल था फिर भी दिल मेरा
मेरे ख़लूस पर तोहमत लगाया करता था

कुछ इसलिए भी ज़ियादा थी रौशनी मेरी
कि मैं चराग़ नहीं दिल जलाया करता था

मेरे वुजूद में जब भी घुटन सी होती थी
मैं घर की छत पर कबूतर उड़ाया करता था

  - Kabir Athar

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