रोज़-ओ-शब यूँँ न अज़िय्यत में गुज़ारे होते
चैन आ जाता अगर खेल के हारे होते
ख़ुद से फ़ुर्सत ही मुयस्सर नहीं आई वरना
हम किसी और के होते तो तुम्हारे होते
तुझ को भी ग़म ने अगर ठीक से बरता होता
तेरे चेहरे पे ख़द-ओ-ख़ाल हमारे होते
खुल गई हम पे मोहब्बत की हक़ीक़त वरना
ये जो अब फ़ाइदे लगते हैं ख़सारे होते
एक भी मौज अगर मेरी हिमायत करती
मैं ने उस पार कई लोग उतारे होते
लग गई और कहीं उम्र की पूँजी वरना
ज़िंदगी हम तेरी दहलीज़ पे हारे होते
ख़र्च हो जाते इसी एक मोहब्बत में 'कबीर'
दिल अगर और भी सीने में हमारे होते
— Kabir Athar















