अभी वो हँस रही होगी बहुत ख़ुश हो रही होगी

यक़ीनन उस के हाथों पर हिना भी रच गई होगी

तसव्वुर था उसे ख़ुद की मुकम्मल सी ग़ज़ल कहता
नदामत है कि वो दुल्हन किसी की बन चुकी होगी

महल के कू-ब-कू उस के लगा रक्खे हैं पहरेदार
महल जैसी क़फ़स में बैठ के अब रो रही होगी

अमीरों से फ़क़ीरों सी मुहब्बत मिल नहीं सकती
कहा भी था कि महलों में हमेशा तीरगी होगी

मुहैया हो तो जाएँगे सभी आसाइशें उस को
मगर वो बंद कमरे में मुझे तो ढूँढती होगी

करेंगे तज़्किरा सब बारहा मेरी मुहब्बत का
कहीं गर बज़्म में बातें वफ़ा की चल रही होगी

हज़ारों कोशिशें कर ले भले मुझ को भुलाने की
भुलाने का मुझे बस एक रस्ता ख़ुद-कुशी होगी

— Rovej sheikh

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