दरमियाँ फ़ासला है मदद कीजिए

और वो जा रहा है मदद कीजिए

वो सिखाकर गया मुझ को दुनिया के तौर
बचपना मर गया है मदद कीजिए

उस ने खाई है फिर से वफ़ा की क़सम
और वो बे-वफ़ा है मदद कीजिए

क्या वो सच्ची किसी और का हो गया
या ये कोई हवा है मदद कीजिए

मैं बहुत चाहता हूँ उसे, क्या करूँ
वो नहीं चाहता है मदद कीजिए

टूट कर जुड़ते हैं जो वो क्या करते हैं
मुझ को भी जानना है मदद कीजिए

देखना था मुझे तीसरे को मगर
बीच में वो खड़ा है मदद कीजिए

मुझ से रिश्ता निभाया नहीं उस ने और
उस से कितना जुड़ा है ! मदद कीजिए

दिल से केवल दुआएँ निकलती हैं पर
होंठों पर बद-दुआ है मदद कीजिए

भूलने की दवा किस जगह मिलती है
जिस किसी को पता है मदद कीजिए

जीने का हौसला रख रहे हैं मगर
अब नहीं हो रहा है मदद कीजिए

— Kinshu Sinha

More by Kinshu Sinha

Other ghazal from the same pen

See all from Kinshu Sinha →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling