तेरी यादों का फिर सफ़र निकला
दिल के वीराँ से इक शरर निकला
चाँदनी तक थी सोज़ में डूबी
जब तेरा ज़िक्र दर-बदर निकला
हर तसव्वुर में तुझ को ही देखा
फिर भी कोई न हम सेफ़र निकला
ज़ख़्म मुस्कान में बदलते गए
तेरा अंदाज़ इस क़दर निकला
'इश्क़ में जब क़दम बढ़ा बैठे
हर क़दम पर ही इक ख़तर निकला
ख़्वाब जो आँखों में सजाए थे
उन
में हर पल कोई असर निकला
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