सभी के साथ में इक ऐसा वक़्त आता है
मुनाफ़िक़ों का भी ईमान जाग जाता है
कभी किसी से न कहना तू साथ चलने को
यहाँ पे हर कोई एहसान ही जताता है
अगर वो पास नहीं रखना चाहता है हमें
तो क्यूँ वो रोज़ हमें अपना ग़म सुनाता है
ये दौर ऐसा चला है कि अब हमेशा ही
किसी मुदावे से पहले कमेंट आता है
इसे मैं प्यार कहूँ या कोई बुरी आदत
जड़ें उखाड़ के दुख पेड़ के सुनाता है
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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