वरक़ पे शे'र लिक्खा पर अधूरा छोड़ आए
समुंदर की तरफ़ आँखों का दरिया छोड़ आए
हमें मंज़ूर है ये हार पर सौदा नहीं दोस्त
अना के वास्ते सोने का तमगा छोड़ आए
फ़क़त उसकी झलक के वास्ते नुक़्सान झेला
कभी ये इस्तरी या गैस जलता छोड़ आए
यूँँ तो सब रख लिया हम ने मकाँ को बेचते वक़्त
मगर दीवार पे यादों का जाला छोड़ आए
कभी भी भूल पाएगा नहीं वो जंग दुश्मन
लड़े थे ख़ूब पर मरहम का ज़रिया छोड़ आए
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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