बर्ग-ए-ख़िज़ाँ हो ही रही रुत आने जाने के लिए
शाख़-ए-निहाल-ए-ग़म हरी होगी ज़माने के लिए
रिश्ते कभी तो मुंसलिक होते किसी के दर्द में
कोई कसर बाक़ी नहीं रखना हँसाने के लिए
चेहरा बयाँ जब इश्क़ ही करता ज़बान-ए-हाल भी
दिल इसलिए तुझ को दिया है आज़माने के लिए
ऐसे कोई कब रूठता है यार मेरे तू बता
साथी पुराने ख़ास ही होंगे मनाने के लिए
इसरार क्या तकरार क्या जो है 'मनोहर' बोल दे
इक दोस्त होना चाहिए सुनने सुनाने के लिए
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