जो दिये दियों से जले बुझे ही नहीं उन्हीं का ये काम है
यूँँ ही कारवाँ बढ़े रौशनी सा ये ज़िंदगी का क़याम है
ये वुजूद और हरी-भरी तेरी बरकतें दिखें हर जगह
किसी की ज़बाँ में लिखा हुआ सुना माँ तुझे ही सलाम है
न उदास हो न शिकायतें किसी की करो अभी तुम सनम
ये मुहब्बतें ये शराफ़तें ये बखान किस का क़लाम है
मिली ढ़ेर सारी नसीहतें हमें ज़िंदगी के ही मोड़ पर
वो पड़ाव भी तो अजीब सा ही लगे मुझे वो क़याम है
वो महक चमक कहाँ खो गई वो निज़ाम ही अभी है कहाँ
वो कभी रहा हो फ़लक पे फिर भी बग़ैर उसके ये शाम है
वो उसूल बुत से बड़े हुए वो हक़ीक़तन ही कड़े हुए
रहे सब के सिर्फ़ दिलों में अब वो फ़क़त ख़ुदा का ही नाम है
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