khwahishon se vo kahaan in ke hue | ख़्वाहिशों से वो कहाँ इन के हुए

  - Manohar Shimpi

ख़्वाहिशों से वो कहाँ इन के हुए
छोड़ के फिर साथ कमसिन के हुए

रात भी मुश्किल से कटती हिज्र में
चाँद तारे अर्श के गिन के हुए

बेच के कूड़ा चलाते घर कोई
एक सौ रुपए कभी दिन के हुए

हुस्न ला-फ़ानी नहीं है हम-सफ़र
देख के इक ही दफ़ा सिन के हुए

उस बलंदी पर कभी हम भी रहे
टूट के फिर रात क्या दिन के हुए

दौर था कैसा 'मनोहर' ख़ूब वो
फ़ासलों से हम-नफ़स जिन के हुए

  - Manohar Shimpi

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