कई दिनों से लगे यूँँ ही अब किसी पे एहसान कौन करता
ये मुद्दआ फ़ालतू नहीं फिर भी ग़ौर से ध्यान कौन करता
नया नया 'इश्क़ ही हुआ है अगर तुम्हें इत्तिफ़ाक से ही
उसी के इज़हार पर भरोसा नहीं तो एलान कौन करता
ये इंतिहा इश्क़बाज़ की तय किसी ने की है ज़रा बताओ
बिना शरारत से प्यार बेहद हो तो परेशान कौन करता
नवाज़ दे या ख़ुदा मुझे भी कभी सदारत से तेरे यूँँ ही
कि एक नाचीज़ के लिए फिर ये राह आसान कौन करता
मुझे मेरी रूह ही मनोहर बताए शय कैसे शायरी है
पढ़े इबादत करे उसे दिल से ही तो हैरान कौन करता
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