हुस्न की तुर्फ़गी किसे मिलती
साथ में सादगी किसे मिलती
है अगर बा-सफ़ा मुहब्बत तो
ऐसे दीवानगी किसे मिलती
'इश्क़ की ख़ामुशी ज़ुबाँ होती
फिर ये आज़ुर्दगी किसे मिलती
आज कल गुल भी काग़ज़ी होते
फिर तर-ओ-ताज़गी किसे मिलती
राह जब एक ही रहे आख़िर
फिर तेरी बंदगी किसे मिलती
रोज़ चलते सभी इशारे पर
अस्ल की ज़िंदगी किसे मिलती
और क्या चाहिए 'मनोहर' अब
ऐसे दिलबस्तगी किसे मिलती
Read Full