'इश्क़ की वो इक कहानी और है
जोश में की ख़ुश-बयानी और है
वो मुहब्बत सिर्फ़ पन्नों में रही
आशिक़ी की बेज़ुबानी और है
जब सियानी कोई लड़की हो विदा
आँख में दिखता वो पानी और है
संग-दिल ने जो बताई और थी
'इश्क़ वाली वो ज़बानी और है
लोग पत्थर दिल कहाँ होते यहाँ
'इश्क़ में फिर से रवानी और है
सिर्फ़ दर्द-ए-ग़म सुनाऊँ क्यूँ अभी
दिल-लगी तो है जवानी और है
हीर-राँझा 'इश्क़ करते थे कभी
वो मुहब्बत की कहानी और है
हल चलाना और ही है खेत में
बाग़ में की बाग़बानी और है
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