खेल कोई बनाम रहता है
हश्र का भी मक़ाम रहता है
मयकदे में कहाँ सभी मिलते
सिर्फ़ क़िस्सा तमाम रहता है
बंदगी भी लगे बड़ी लेकिन
अब दिल-ओ-दिल में राम रहता है
ऐ मुहब्बत नसीब हो तो फिर
महज़ मिलना ही आम रहता है
कौन सा ताज सर पे होता है
'उम्र भर सिर्फ़ नाम रहता है
इक नज़र से अगर नशा होता
हाथ क्यूँँ कोई जाम रहता है
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