अँधेरे में दिए जलकर सुहानी शाम हो जाए
उजालों से करे रौशन जहाँ वो नाम हो जाए
मुसलसल ही अगर दोनों कि आँखें एक हो जाए
उसी दहलीज़ पर आशिक़ कोई बदनाम हो जाए
दिलों दिल से सफ़र में इस तरह आवाज़ दो हमको
उसे सुनते कोई बिखरा हुआ भी काम हो जाए
पता सब है किधर जन्नत कहाँ है कौन सा रस्ता
मुसाफ़िर कोई जाने क्यूँ वहाँ नाकाम हो जाए
बहुत कम वक़्त में उसका कहीं रिश्ता हुआ आख़िर
इरादे हम-सफ़र के इस क़दर नीलाम हो जाए
यही क़िस्से मुहब्बत के हमारे पास रहने दो
न जाने फिर 'मनोहर' वो कभी गुमनाम हो जाए
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