सोच के ही मुफ़लिसी को कौन घर जाता हमेशा
देख के आँसू किसी के भी बिखर जाता हमेशा
कोई मंज़र देख के जब दिल दहलता है कहीं पर
उस जगह से फिर गुज़रते ही सिहर जाता हमेशा
जिंदगी क़ा ये सफऱ आसान होता ही कहाँ है
रंज अपनों से रहे तब फिर ठहर जाता हमेशा
वक़्त ऐसे क्यूँँ ठहरता मुफ़लिसी में ही किसी की
सोच के हालात पर मैं ख़ूब डर जाता हमेशा
वक़्त के ही साथ चलना भी मनोहर जानता हूँ
हश्र जब नाकाम हो तो फिर किधर जाता हमेशा
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