दिलों में इत्तिफ़ाक़न बेकसी कैसे
किसी भी मुद्दआ से बे-रुख़ी कैसे
मुहब्बत पर लिखोगे इस क़दर तो फिर
कहेंगे लोग उसको शाइरी कैसे
कई सारे तमाशाई कभी लगते
जिन्हें समझा क़रीबी 'आरज़ी कैसे
ज़माने ने हमारा 'इश्क़ तो देखा
नहीं देखी कभी दीवानगी कैसे
मिले हमराह कोई इत्तिफ़ाक़न ही
करोगे राह चलते दोस्ती कैसे
नवाजेंगे तुम्हें अच्छे समय में सब
बुरे हालात में फिर बे-रुख़ी कैसे
कभी थे हम भी इतने काम के लेकिन
सुनोगे अब 'मनोहर' बेकसी कैसे
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