हम सेफ़र क्यूँ इस क़दर आँखे भिगोने का
वक़्त तो लगता न रिश्तों में पिरोने का
आग से हैं ख़ूब खेले इस सफ़र में हम
दर्द होता है हमें गुमराह होने का
हिज्र में जब भी ख़लिश ही सख़्त होती है
तब समझना वक़्त आया एक होने का
फूल खिलते हैं बिखर जाते यहाँ पर ही
वक़्त ये है 'इश्क़ के फिर बीज बोने का
ख़्वाब तेरा देखना इक ज़ख़्म ही तो है
'इश्क़ है तो दर्द होगा दाग़ धोने का
ये उदासी अब न अच्छी रोज़ लगती है
जब कभी ग़म हो अकेले ख़ूब रोने का
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