अवाम तंग ही दिखी बड़ी मुसीबत है
तबाह बाढ़ ने किया कहें कुदूरत है
किसी गरीब को कहाँ नसीब है रोटी
गई कहाँ जो भी लगे बहुत वो बरकत है
हरेक शख़्स जो लगे सरोज जैसे ही
किसी ज़मीं पे ही खिली कोई इमारत है
हरी भरी फ़सल वहाँ उजड़ गई ऐसे
हुई कमी अनाज की कहाँ हुकूमत है
कभी कहीं मिली मिरी निगाह उन सेे तब
यहीं पता लगा वो सच में ख़ूब-सूरत है
कोई लिखी हुई ग़ज़ल में और नज़्मों में
पता लगा हरेक शक्ल और सूरत है
जिसे सभी विराजमान देखते हैं वो
कई दफ़ा तराश के बनी वो मूरत है
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