लौट के कहाँ आते यादगार थे वो दिन
दोस्त रोज़ मिलते थे शानदार थे वो दिन
दौर और ही था वो और क्या ग़ुलामी थी
क्या कहूँ तुम्हें यारों ख़ूब ख़्वार थे वो दिन
इल्म था किसे यारों ज़िंदगी जिएँ कैसे
प्यार ही भरे दिन थे इज़्तिरार थे वो दिन
हिज्र से गुज़रना भी एक तजरबा ही था
कैसे फिर बताएँ क्या दर-किनार थे वो दिन
कैसे भूल सकते तब साथ दोस्त सारे थे
याद है 'मनोहर' क्या ख़ुश-गवार थे वो दिन
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