कोई मंज़र हमें गवारा नइँ
वो हसीं जिस्म गर हमारा नइँ
इश्क़ वो कारोबार है जिस में
हो ख़सारा भी तो ख़सारा नइँ
ज़ुल्म करता रहा मुसलसल वो
चीख़ता मैं रहा ख़ुदारा नइँ
क्या अजब रिश्ता-ए-मोहब्बत है
वो हमारा है पर हमारा नइँ
दोस्त ये आस्तीन है मेरी
ये कोई साँप का पिटारा नइँ
दुश्मन-ए-जाँ है पर सितम ये है
उस से बढ़कर भी कोई प्यारा नइँ
'मीम मारूफ़' कब ये समझोगे
तुम हो उस के, वो पर तुम्हारा नइँ
— Meem Maroof Ashraf















