तुझ को हर हाल हम ने पाना था
वो ज़माना भी क्या ज़माना था
इस क़दर ही तो पास थे हम तुम
जिस क़दर हम को दूर जाना था
नाज़नीं, ग़ैर ने तो बस तेरे
जिस्म का फ़ाएदा उठाना था
देख अब और अच्छी लगती है
यार चश्मा नहीं लगाना था
बात अल-क़िस्सा-मुख़्तसर ये है
इक हसीना थी इक दिवाना था
— Meem Maroof Ashraf















