zindagi roz koii taaza safar maangti hai | ज़िंदगी रोज़ कोई ताज़ा सफ़र माँगती है

  - Meraj Faizabadi

ज़िंदगी रोज़ कोई ताज़ा सफ़र माँगती है
और बेचारी थकन शाम को घर माँगती है

तुझ से मैं कैसे मिलूँ कैसे निभाऊँ रिश्ता
दुश्मनी भी तो बहरहाल हुनर माँगती है

पहले ताईद तलब करते थे रहबर अपने
इन दिनों कैसी सियासत है जो सर माँगती है

हर क़दम पर रसन-ओ-दार दिखाई देंगे
पैरवी सच की मेरे यार जिगर माँगती है

मुझ को सूली पे चढ़ाकर भी दुखी है दुनिया
वो मेरी मौत नहीं आँखों में डर माँगती है

  - Meraj Faizabadi

More by Meraj Faizabadi

As you were reading Shayari by Meraj Faizabadi

    बिखरे बिखरे सहमे सहमे रोज़-ओ-शब देखेगा कौन
    लोग तेरा जुर्म देखेंगे सबब देखेगा कौन

    हाथ में सोने का कासा ले के आए हैं फ़क़ीर
    इस नुमाइश में तिरा दस्त-ए-तलब देखेगा कौन

    ला उठा तेशा चटानों से कोई चश्मा निकाल
    सब यहाँ प्यासे हैं तेरे ख़ुश्क लब देखेगा कौन

    दोस्तों की बे-ग़रज़ हम-दर्दियाँ थक जाएँगी
    जिस्म पर इतनी ख़राशें हैं कि सब देखेगा कौन

    शाइरी में 'मीर'-ओ-'ग़ालिब' के ज़माने अब कहाँ
    शोहरतें जब इतनी सस्ती हों अदब देखेगा कौन
    Read Full
    Meraj Faizabadi
    और चुप रहने पे तैयार नहीं हैं हम लोग
    आदमी हैं दर-ओ-दीवार नहीं हैं हम लोग

    धूप और छाँव का जादू न चलाओ हम पर
    चढ़ते सूरज के परस्तार नहीं हैं हम लोग

    हम से ज़िंदा है ज़माने में तमद्दुन का निज़ाम
    मुर्दा तहज़ीबों के आसार नहीं हैं हम लोग

    जिन को किरदार का मफ़्हूम बताया हम ने
    वो कहें साहब-ए-किरदार नहीं हैं हम लोग

    जाओ तारीख़ के औराक़ पलटकर देखो
    फिर ये कहना कि वफ़ादार नहीं हैं हम लोग
    Read Full
    Meraj Faizabadi
    ज़िंदा रहना है तो हालात से डरना कैसा
    जंग लाज़िम हो तो लश्कर नहीं देखे जाते
    Meraj Faizabadi
    22 Likes
    ये और बात कि काँधों पे ले गए हैं उसे
    किसी बहाने से दीवाना आज घर तो गया
    Meraj Faizabadi
    28 Likes
    जाने कब चुभ जाए आँखों में कोई बे-रहम सच
    आइना भी देखने वालो सँभल कर देखना
    Meraj Faizabadi
    10 Likes

Similar Writers

our suggestion based on Meraj Faizabadi

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari