बदन मिट्टी हवा पानी किसानी से

बिना पैसे के गुड़-घानी किसानी से

वबा का दौर लेकिन जी रहे हैं सब
जिए जाने में आसानी किसानी से

यूँ समझो शहर की साँसें हमीं से है
ख़ुशी का रंग फिर धानी किसानी से

तुम्हारे बा'द वैसे भी बचा था क्या
मिरी आँखों में ताबानी किसानी से

यहाँ तक तो इबादत थी सुनो आगे
निगहबानी से यज़्दानी किसानी से

लटें उलझी कटारी नैन और फिर नथ
मिला है चाँद का सानी किसानी से

वो इक लड़की वो जो है धान की बाली
हसीं मंज़र बदन-ख़्वानी किसानी से

कफ़न का लाश से जो है वही है 'नीर'
नया रिश्ता ये जिस्मानी किसानी से

— Neeraj Neer

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