zehan ko kabze men kar uljhan na choome | ज़ेहन को कब्ज़े में कर उलझन न चू

  - Neeraj Neer

ज़ेहन को कब्ज़े में कर उलझन न चू
में 'इश्क़ यानी तिफ़्ल सा दामन न चू
में
*तिफ़्ल- बच्चा

वस्ल का मतलब नहीं बस चूमना है
आग से कह दो अभी ईंधन न चू
में

जिस्म वालों को हिदायत है मगर फिर
भूलकर भी वो मिरा ये मन न चू
में

सोचता हूँ क्या करेगी हिज्र में वो
याद आने पर कहीं दर्पन न चू
में

ठीक है मैं फेर लेता हूँ नज़र को
तुम भी झुमके से कहो गर्दन न चू
में

हो सके तो जान रोको घुंघरू को
रक़्स करते पाँव की छन-छन न चू
में

मैं तो उसका नाम लिखकर चूमता हूँ
बाँवली वो हाथ के कंगन न चू
में

चूमने की रस्म बाकी है अभी भी
डर है पहले देह को उबटन न चू
में

दिल निशाने पर रखा इस बार उसने
कैसे कह दूँ तीर को धड़कन न चू
में

'नीर' ख़्वाहिश है मिरी ज़िंदा लगूँ मैं
मारे वहशत के फ़कत बस तन न चू
में

-नीरज नीर

  - Neeraj Neer

Narazgi Shayari

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