Irshad Siddique "Shibu"

Irshad Siddique "Shibu"

@Irshadshibu27

Irshad Shibu shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Irshad Shibu's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

इस लिए भी ज़ुल्म पे चुप हूँ सब्र का फल मीठा होता है — Irshad Siddique "Shibu"
ला तेरे पैरों को चूम लूॅं मैं ऐ दोस्त सुना है उस के शहर से हो कर आया है — Irshad Siddique "Shibu"
ज़रा मैं भी देखूँ वो दिल्ली चीज़ है क्या दोस्त जहाँ पे आ के मुझ को भूल गए — Irshad Siddique "Shibu"
साथ में मस्ज़िद का मेहमान चला जाएगा जैसे ही माहे रमज़ान चला आएगा — Irshad Siddique "Shibu"
पुराने महल टूटता देख कर मुझे बूढ़ा होने से डर लगता है — Irshad Siddique "Shibu"
नईं मिलना गर भेज कोई फ़ोटो ही प्यासे को क़तरा भी बहुत होता है — Irshad Siddique "Shibu"
काम नहीं शैतानों का अब दुनिया में इंसानों से हैं इंसान परेशान यहाँ — Irshad Siddique "Shibu"
हमीं देते हैं पत्थर को कोई चेहरा हमीं हैं पूजते शाम-ओ-सहर उस को — Irshad Siddique "Shibu"
इस तरह से उस ने मुझ को याद रक्खा है नाम अपने बेटे का इरशाद रक्खा है — Irshad Siddique "Shibu"
एक मियान में दो तलवार नहीं हो सकते सो इक काम करो तुम लौटा दो दिल मेरा — Irshad Siddique "Shibu"
भले किसी के भी लिए मैं रस्ता नइँ बना मगर किसी के रास्ते में काँटा नइँ बना — Irshad Siddique "Shibu"
बहुत ही देर कर दी लौटने में ख़ुदा का हो गया जो था तुम्हारा — Irshad Siddique "Shibu"
तुम्हारे दिल की पूजा होती होगी तुम्हारा दिल जो पत्थर का है जानी — Irshad Siddique "Shibu"
जिस का कोई वजूद नहीं है राम बिना वो कहते हैं हम श्री राम को लाएँगे — Irshad Siddique "Shibu"
रात अगर सोने के लिए है मौला तो फिर इन आँखों को नींद अता कर — Irshad Siddique "Shibu"
किसी की बद-दुआओं का नतीजा है ये 'इरशाद' वगरना ये मुहब्बत मेरी क़िस्मत में कहाँ थी — Irshad Siddique "Shibu"

Ghazal

Nazm

"ज़ुल्म" मैं अपने हाथों की सारी नसें काट देना चाहता हूँ ताकि मेरे जिस्म से वो सारा ख़ून बह जाए जो ज़ुल्म को देख कर नहीं खौलता मैं अपने सीने से उस दिल को निकाल के फेंक देना चाहता हूँ जो हुकूमत के ख़िलाफ़ लड़ने से डरता है मैं अपने उन आँखों को नोच के फेंक देना चाहता हूँ जो बहुत बेशर्म हो चुकी हैं जो ज़ुल्म-ओ-सितम को देख कर अंधे होने का नाटक करती हैं मैं अपने उस ज़बान को काट कर फेंक देना चाहता हूँ जिस सेे इंकलाब का नारा नहीं बोला जाता या'नी कि कुल मिला कर मैं उस जिस्म को मिटा देना चाहता हूँ जो सोफ़े पे लेटे हुए टीवी पे हुकूमत की तानाशाही देख रहा है मैं अपने अंदर के उस आदमी को ज़िंदा रखना चाहता हूँ जिस की आँखें जिस का दिल जिस का ख़ून जिस का लब हुकूमत की तानाशाही पे ख़ामोश न रहता हो — Irshad Siddique "Shibu"