मज़म्मत है मज़म्मत है मज़म्मत है मज़म्मत है
फ़क़त मुझको ही क्या इस दुनियाभर को तुझ सेे दिक़्क़त है
वो इंसाँ कैसे हो सकता जिसे इंसाँ से नफ़रत है
वो मज़हब क्या न जिस
में बाइस-ए-अम्न-ओ-मोहब्बत है
कहाँ जन्नत मिलेगी उनको जो हैं अम्न के क़ातिल
ये मासूमों पे हैबत किस पयम्बर वाली उम्मत है
वो दहशत-गर्द थे या कायरों का झुंड था कोई
निहत्थों और मासूमों पे गोली कैसी वहशत है
ये किस मज़हब की सिखलाई है किस अल्लाह का है पैग़ाम
अगर मज़हब यही है फिर तो यह गंदी हिमाक़त है
अगर तुम जंग-जू होते तो करते आ के दो-दो हाथ
मगर तुम कायरों में कब भला होनी ये हिम्मत है
मुजाहिद कहते हो ख़ुद को है मतलब भी तुम्हें मालूम
अगर ऐसे मुजाहिद हो मियाँ फिर तुम पे लानत है
यूँँ बेबस और मज़लूमों निहत्थों पर तुम्हारा वार
सुबूत इस बात का है तुम में कुफ़्रों की अलामत है
अभी 'उपमन्यु' सारे सब्रों की सीमाएँ होती ख़त्म
तुम्हें अब देखना होगा कि हम में कितनी जुर्रत है
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