ये ख़ामोशी है उसकी जो हमारी जान लेती है
फ़ज़ाओं और हवाओं के सभी अरमान लेती है
मैं लव की चाशनी में घोल कर दिल जोड़ दूँ उसका
मगर वो हम गरीबों के कहाँ एहसान लेती है
मैं झपकी ले ही पाता हूँ उसे सोया समझ कर ज्यूँँ
वो मुझको छेड़कर चुपचाप चादर तान लेती है
हमारे घर में इक छत के तले हम दोनों रहते हैं
मैं गीता पढ़ता हूँ वो पढ़ने को क़ुरआन लेती है
किसी के प्यार में पागल न हो इतना भी 'नित्यानन्द'
जहाँ में आजकल लड़की कई मीज़ान लेती है
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