रोटियाँ कुछ दिन तलक ही ज़ुल्म ढाती हैं फ़क़त
मेहनतें कुछ आगे चलकर रंग लाती हैं फ़क़त
चीर देते हैं समंदर का अहम जो मेहनती
क़िस्मतें पहलू में उनको ही बिठाती हैं फ़क़त
बादलों से बात करते जो ख़ुदी को कर बुलंद
ये हवाएँ नाज़ भी उनके उठाती हैं फ़क़त
बीज बनकर जो परिश्रम का दबे भूगर्भ में
कोपलें भी एक दिन उनको ही आती हैं फ़क़त
जिन के ज़िंदा हौसलों ने दम कभी तोड़ा न हो
ये सफलताएँ उन्हें अपना बनाती हैं फ़क़त
रौशनी में जिनकी दम-खम है वो चमकेंगे ज़रूर
रातें 'नित्यानन्द' झूठा डर दिखाती हैं फ़क़त
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