अजीब तुम भी तमाशा बनाए फिरते हो
ज़रा सी बात पे यूँँ मुँह फुलाए फिरते हो
क़ुसूर अपना छुपाने को तुम सरासर यूँँ
लो कोहिनूर को पत्थर बताए फिरते हो
खिले हो जिसके बग़ीचे में फूल बन कर के
उसे मिटाने की साज़िश रचाए फिरते हो
किसी की साख मिटाने की मातहत यूँँ ही
फजूल झूठ का परचम उठाए फिरते हो
ज़मीर बेच दिया ख़ुद का चंद पैसों में
कई की पीठ में ख़ंजर धसाए फिरते हो
शिखण्डियों की लिए फ़ौज साथ में उस पर
तुम अपने ख़ुद को जियाला जताए फिरते हो
दबे हैं क़ब्र में लाखों हम और तुम जैसे
ग़ुरूर-ए-'ऐब में फिर क्यूँ नहाए फिरते हो
किसी का दर्द घटाओ कि 'नित्य' मरहम बन
तुम और घाव को उसके बढ़ाए फिरते हो
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