गर अहिंसा की हुई हार तो फिर क्या होगा
आई ग़द्दारों की सरकार तो फिर क्या होगा
कुछ जो इंसाँ के लहू में हैं सने हाथ वही
बन गये तख़्त के हक़दार तो फिर क्या होगा
रहनुमा ख़ुद को बताने लगे सय्याद भी अब
मौत बाँटेंगे धुआँधार तो फिर क्या होगा
ज़िम्मेदारी दो जिन्हें गोश्त की रखवाली की
निकलें' वो गिद्धों के सरदार तो फिर क्या होगा
सारे क़िरदार हैं क़ातिल तो कहे कौन किसे
अहले मनसब हों गुनहगार तो फिर क्या होगा
तालिबे इल्म जिन्हें लोग समझ बैठे हैं
कल को निकले वही अय्यार तो फिर क्या होगा
'नित्य' मौतों के फ़रिश्तों से है उम्मीद भी क्या
ताज पहनें कहीं हथियार तो फिर क्या होगा
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