बैठा नदी के पास यही सोचता रहा
कैसे बुझाऊँ प्यास यही सोचता रहा
शादाब वादियों में वो सूखा हुआ दरख़्त
कितना था बेलिबास यही सोचता रहा
कितने लगे हैं घाव मैं करता रहा शुमार
कितना हुआ उदास यही सोचता रहा
इस अंधी दौड़ में करे किस सिम्त अपना रुख़
हर फ़र्द बदहवा से यही सोचता रहा
इज़हारे 'इश्क़ जिसने सरेआम कर दिया
वो पल था कितना ख़ास यही सोचता रहा
पत्थर की तर्ह पाँव हैं मेरे तो किसलिए
चुभती है नर्म घास यही सोचता रहा
उस सेे तो मैं बिछड़ गया अब देख ऐ 'पवन'
कब दुनिया आए रास यही सोचता रहा
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