Ahmad Zafar

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Ahmad Zafar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ahmad Zafar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कौन डूबेगा किसे पार उतरना है 'ज़फ़र' फ़ैसला वक़्त के दरिया में उतर कर होगा — Ahmad Zafar

Ghazal

मैं यूँँ तो नहीं है कि मोहब्बत में नहीं था अलबत्ता कभी इतनी मुसीबत में नहीं था अस्बाब तो पैदा भी हुए थे मगर अब के उस शोख़ से मिलना मिरी क़िस्मत में नहीं था तय मैं ने किया दिन का सफ़र जिस की हवस में देखा तो वही रात की दावत में नहीं था इक लहर थी ग़ाएब थी जो तूफ़ान-ए-हवा से इक लफ़्ज़ था जो ख़त की इबारत में नहीं था कैफ़ियतें सारी थीं फ़क़त हिज्र तक उस के मैं सामने आ कर किसी हालत में नहीं था क्या रंग थे लहराए थे जो राह-रवी में क्या नूर था जो शम-ए-हिदायत में नहीं था लग़्ज़िश हुई कुछ मुझ से भी तुग़्यान-ए-तलब में कुछ वो भी 'ज़फ़र' अपनी तबीअत में नहीं था — Ahmad Zafar
देरीना ख़्वाहिशों से सजाया गया मुझे मक़्तल में किस फ़रेब से लाया गया मुझे बार-ए-समर से शाख़-ए-शजर झुक गई तो क्या मैं बे-समर था फिर भी झुकाया गया मुझे सय्यारा-ए-ज़मीं है कहाँ सोचता हूँ मैं पाताल में फ़लक से गिराया गया मुझे मैं नक़्श-ए-हिज्र-ए-यार हूँ शब की फ़सील पर जलता हुआ चराग़ बनाया गया मुझे लाए हैं रेज़ा रेज़ा किसी आइने के पास मेरा ही जिस्म जैसे दिखाया गया मुझे पत्थर में जब गुलाब महकते दिखा दिए ये मो'जिज़ा नहीं है बताया गया मुझे चश्मों के पास हो के भी प्यासा हूँ मैं 'ज़फ़र' रेग-ए-रवाँ का रक़्स दिखाया गया मुझे — Ahmad Zafar
यूँँ ज़माने में मिरा जिस्म बिखर जाएगा मिरे अंजाम से हर फूल निखर जाएगा जाम ख़ाली है सुराही से लहू बहता है आज की रात वो महताब किधर जाएगा सैल-ए-गिर्या मिरी आँखों से ये कह जाता है बस्तियाँ रोएँ तो दिया भी उतर जाएगा तो कोई अब्र-ए-गुहर-बार समुंदर के लिए दिल के सहरा से जो चुप-चाप गुज़र जाएगा आज ये ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ है ज़माने के लिए कल यही दौर किसी तौर सँवर जाएगा तेरी हर बात पे मर जाता हूँ मरता भी नहीं कि मिरी मौत में इंसाँ कोई मर जाएगा अश्क मोती से बिखर जाएँगे राहों में जहाँ सू-ए-मंज़िल भी मिरा दीदा-ए-तर जाएगा मैं मकीं हूँ न मकाँ शहर-ए-मोहब्बत का 'ज़फ़र' दिल मुसाफ़िर न किसी ग़ैर के घर जाएगा — Ahmad Zafar
आसमाँ की आँख सूरज चाँद बीनाई भी है रौशनी मेरे लिए क्यूँँ वज्ह-ए-रुस्वाई भी है किस को सीने से लगाऊँ मैं किसे अपना कहूँ सैल-ए-रंग-ओ-बू जिसे कहते हैं तन्हाई भी है मस्लहत अंदेशा-ए-ग़म को ज़रा कम कर गई फ़ल्सफ़ा वो झूट शामिल जिस में दानाई भी है ज़हर-आलूदा फ़ज़ा में जब कली सोने लगी अश्क-ए-शबनम ने कहा गुलशन में पुर्वाई भी है फ़िक्र जैसे आइना-दर-आइना रौशन चराग़ तीरगी मेरे लिए एहसास-ए-रा'नाई भी है मुन्कशिफ़ होते गए हम-सूरत-ए-संग-ए-वजूद ज़िंदगी हुस्न-ए-अदम भी कार-फ़रमाई भी है शे'र कहने का सलीक़ा है यही अहमद-'ज़फ़र' शाइरों ने बात समझी भी है समझाई भी है — Ahmad Zafar
क्या पता किस जुर्म की किस को सज़ा देता हूँ मैं रंग सा इक बाँधता हूँ फिर भुला देता हूँ मैं अपने आगे अब तो मैं ख़ुद भी ठहर सकता नहीं सामना होते ही चुटकी में उड़ा देता हूँ मैं मो'जिज़ा अगला तो अब शायद पुराना हो चला देखना अब के कोई चक्कर नया देता हूँ मैं मुझ से आगे भी निकल जाना बहुत मुश्किल नहीं आज-कल आहिस्ता-रौ हूँ रास्ता देता हूँ मैं शोर सा उठता है और उठते ही दब जाता है अब हर्फ़ सा लिखने से पहले ही मिटा देता हूँ मैं ताकि मेरी सुल्ह-जूई को लगे कुछ भाव भी हर नए फ़ित्ने को दर-पर्दा हवा देता हूँ मैं बात भी सुनता नहीं हूँ वस्ल में दिल की 'ज़फ़र' ऐसे ख़र-मस्तों को महफ़िल से उठा देता हूँ मैं — Ahmad Zafar
अपने ही किसी साए से टकराया हूँ फिर भी महसूस ये होता है यहाँ आया हूँ फिर भी काग़ज़ पे सियाही की तरह फैल रहा हूँ ये हर्फ़-ए-नदामत नहीं शरमाया हूँ फिर भी हर-चंद सफ़र दर्द के दरिया का सफ़र था साहिल के किसी ख़्वाब से घबराया हूँ फिर भी साग़र में सर-ए-शाम लहू मेरा मिला है इक नश्शा-ए-बे-नाम में लहराया हूँ फिर भी हर-चंद किसी जीतने वाले ने सदा दी हारे हुए लोगों में चला आया हूँ फिर भी मिलते ही रहे ज़ख़्म मिरी किश्त-ए-बदन को एहसास के हर फूल का सरमाया हूँ फिर भी सूरज के मुक़ाबिल था 'ज़फ़र' दश्त-ए-सहर में मैं प्यास के सहरा में कोई साया हूँ फिर भी — Ahmad Zafar
किसी परिंदे की वापसी का सफ़र मिरी ख़ाक में मिलेगा मैं चुप रहूँगा शजर की सूरत शजर मिरी ख़ाक में मिलेगा उदास आँखें सुलगते चेहरों की मुझ को आवाज़ दे रही हैं कभी जो आबाद रह चुका है वो घर मिरी ख़ाक में मिलेगा लहू की बारिश में ज़र्द फूलों की पत्तियों से लिखा गया हूँ मैं लफ़्ज़ का ज़ाइक़ा ज़बाँ पर असर मिरी ख़ाक में मिलेगा दयार-ए-शब के भटकते राही शिकार-ए-तश्कीक-ओ-कम-निगाही अलाव रौशन कहीं जो कर दे शरर मिरी ख़ाक में मिलेगा अज़ल से सूरज अबद में तलाश जिस को करता हुआ गया है सदफ़ ज़मीं है तो ज़िंदगी का गुहर मिरी ख़ाक में मिलेगा वो बस्तियाँ जो तबाहियों में नुमू की तस्वीर बन गई हैं वजूद जिन का कहीं नहीं है मगर मिरी ख़ाक में मिलेगा मैं चश्म-ए-पुर-नम की मिशअलों से चराग़-ए-फ़र्दा जला रहा हूँ कि नक़्श-ए-इरफ़ान-ओ-आगही भी 'ज़फ़र' मिरी ख़ाक में मिलेगा — Ahmad Zafar
जब तक जुनूँ जुनूँ है ग़म-ए-आगही भी है या'नी असीर-ए-नग़्मा मिरी बे-ख़ुदी भी है खिलते हैं फूल जिन के तबस्सुम के वास्ते शबनम में उन के अक्स की आज़ुर्दगी भी है कुछ साअ'तों का रंग मिरे साथ साथ है वो निकहत-ए-बहार मगर अजनबी भी है ज़िंदा हूँ मैं कि आग जहन्नम की बन सकूँ फ़िरदौस-ए-आरज़ू मिरे दिल की कली भी है इस याद का भँवर मेरे एहसास में रहा इज़हार-ए-मौज मौज की ना-गुफ़्तनी भी है पलकों पे चाँदनी के तकल्लुम की आँच थी होंटों पे गुफ़्तुगू के लिए तिश्नगी भी है क्यूँँ तीरगी से इस क़दर मानूस हूँ 'ज़फ़र' इक शम-ए-राह-गुज़र कि सहर तक जली भी है — Ahmad Zafar
तन्हाई ने पर फैलाए रात ने अपनी ज़ुल्फ़ें पलकों पर हम तारे ले कर चाँद का रस्ता देखें ये दुनिया है इस दुनिया का रंग बदलता जाए उस पर्बत से पाँव फिस्ले जिस पर्बत को छू लें कैसे प्यास बुझाते दरिया रेत का दरिया निकला लहर लहर में मौज छुपी थी धोके में थी आँखें जिस को मन का मीत बनाया आख़िर दुश्मन ठहरा किस किस को हम मीत बनाएँ किस किस से हम उलझें लोहा सोना बन सकता है पत्थर हीरा मोती सोच समझ की बात है सारी कुछ सोचें कुछ समझें अपना दर्द भुला दें ऐ दिल उस के दर्द की ख़ातिर अपने घाव याद न आएँ चाँद का घाव देखें — Ahmad Zafar
और क्या मेरे लिए अरसा-ए-महशर होगा मैं शजर हूँगा तिरे हाथ में पत्थर होगा यूँँ भी गुज़रेंगी तिरे हिज्र में रातें मेरी चाँद भी जैसे मिरे सीने में ख़ंजर होगा ज़िंदगी क्या है कई बार ये सोचा मैं ने ख़्वाब से पहले किसी ख़्वाब का मंज़र होगा हाथ फैलाए हुए शाम जहाँ आएगी बंद होता हुआ दरवाज़ा-ए-ख़ावर होगा मैं किसी पास के सहरा में बिखर जाऊँगा तू किसी दौर के साहिल का समुंदर होगा वो मिरा शहर नहीं शहर-ए-ख़मोशाँ की तरह जिस में हर शख़्स का मरना ही मुक़द्दर होगा कौन डूबेगा किसे पार उतरना है 'ज़फ़र' फ़ैसला वक़्त के दरिया में उतर कर होगा — Ahmad Zafar
फ़लक पे चाँद नहीं कोई अब्र-पारा नहीं ये कैसी रात है जिस में कोई सितारा नहीं ये इंकिशाफ़ सितारों से भर गया दामन किसी ने इतना कहा जब कि वो हमारा नहीं ज़मीं भँवर हो जहाँ आसमाँ समुंदर हो वहाँ सफ़र किसी साहिल का इस्तिआरा नहीं मैं मुख़्तलिफ़ हूँ ज़माने से इस लिए शायद किसी ख़याल की गर्दिश मुझे गवारा नहीं ख़िज़ाँ के मौसम-ए-ख़ामोश ने सदा दी है जमाल-ए-दोस्त ने फिर भी मुझे पुकारा नहीं जो रेज़ा रेज़ा नहीं दिल उसे नहीं कहते कहें न आईना उस को जो पारा-पारा नहीं मैं ज़ख़्म ज़ख़्म सही फिर भी मुस्कुराया हूँ 'ज़फ़र' ब-नाम-ज़फ़र हार के भी हारा नहीं — Ahmad Zafar
ज़हर को मय न कहूँ मय को गवारा न कहूँ रौशनी माँग के मैं ख़ुद को सितारा न कहूँ अपनी पलकों पे लिए फिरता हूँ चाहत के सराब दिल के सहरा को समुंदर का किनारा न कहूँ हिज्र के फूल में वो चेहरा-ए-ज़र्रीं देखूँ वस्ल के ख़्वाब को मिलने का इशारा न कहूँ मरते मरते भी ये तहरीर अमानत मेरी मौत के ब'अद भी जीने को ख़सारा न कहूँ अपनी तकमील के हर नक़्श में देखूँ उस को अरसा-ए-दहर को हसरत का नज़ारा न कहूँ हश्र से पहले मिरे हश्र की तस्वीर न बन हरफ़-ए-आख़िर को किसी तौर दोबारा न कहूँ ज़िंदगी जिस की मिरे दम से इबारत हो 'ज़फ़र' क्यूँँ कहे कोई उसे जान से प्यारा न कहूँ — Ahmad Zafar
फूल की रंगत मैं ने देखी दर्द की रंगत देखे कौन प्यार का गीत सुना है सब ने धुन थी कैसी सोचे कौन धूप ने तन-मन फूँक दिया तो साए में आ बैठा था शाख़ शाख़ में आग छुपी है पेड़ के नीचे बैठे कौन अपने दर्द को गर्द समझ कर मंज़िल मंज़िल छोड़ दिया आईने पर धूल जमी है आईने में देखे कौन अंग अंग से रंग रंग के फूल बरसते देखे कौन रंग रंग से शो'ले बरसे कैसे बरसे सोचे कौन फ़न तरतीब का ज़ेवर ले कर गुलशन गुलशन उभरा है बे-तरतीबी हुस्न है जिस का उस फ़नकार से उलझे कौन मेरे कोट का मैला कॉलर और नुमायाँ होता है पागल सज-धज रखने वाले तेरे सामने बैठे कौन — Ahmad Zafar
वो फूल जो मुस्कुरा रहा है शायद मिरा दिल जला रहा है छुप कर कोई देखता है मुझ को आँखों में मगर समा रहा है मैं चाँद के साथ चल रहा हूँ वो मेरी हँसी उड़ा रहा है शायद किसी दौर में वफ़ा थी ये दौर तो बे-वफ़ा रहा है सौ रंग हैं ज़िंदगी के लेकिन इंसान फ़रेब खा रहा है तस्वीर बने तो मुझ से कैसे हर नक़्श मुझे मिटा रहा है जो लम्हा पयाम है फ़ना का चुप-चाप क़रीब आ रहा है तूफ़ाँ ने भी आँख खोल दी है साहिल भी नज़र बचा रहा है फ़नकार कहूँ उसे तो कैसे तख़्लीक़ को जो मिटा रहा है तक़दीर मिटा चुकी थी जिस को तदबीर का राज़ पा रहा है आवाज़ से आग लग रही है मुतरिब है कि गीत गा रहा है एहसास-ए-शिकस्त-ओ-कामरानी आईने कई दिखा रहा है वो ख़ाक-नशीं 'ज़फ़र' है यारो जो सू-ए-फ़लक भी जा रहा है — Ahmad Zafar