Ahmad Zafar

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    कौन डूबेगा किसे पार उतरना है 'ज़फ़र'
    फ़ैसला वक़्त के दरिया में उतर कर होगा
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    अपने ही किसी साए से टकराया हूँ फिर भी
    महसूस ये होता है यहाँ आया हूँ फिर भी

    काग़ज़ पे सियाही की तरह फैल रहा हूँ
    ये हर्फ़-ए-नदामत नहीं शरमाया हूँ फिर भी

    हर-चंद सफ़र दर्द के दरिया का सफ़र था
    साहिल के किसी ख़्वाब से घबराया हूँ फिर भी

    साग़र में सर-ए-शाम लहू मेरा मिला है
    इक नश्शा-ए-बे-नाम में लहराया हूँ फिर भी

    हर-चंद किसी जीतने वाले ने सदा दी
    हारे हुए लोगों में चला आया हूँ फिर भी

    मिलते ही रहे ज़ख़्म मिरी किश्त-ए-बदन को
    एहसास के हर फूल का सरमाया हूँ फिर भी

    सूरज के मुक़ाबिल था 'ज़फ़र' दश्त-ए-सहर में
    मैं प्यास के सहरा में कोई साया हूँ फिर भी
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    देरीना ख़्वाहिशों से सजाया गया मुझे
    मक़्तल में किस फ़रेब से लाया गया मुझे

    बार-ए-समर से शाख़-ए-शजर झुक गई तो क्या
    मैं बे-समर था फिर भी झुकाया गया मुझे

    सय्यारा-ए-ज़मीं है कहाँ सोचता हूँ मैं
    पाताल में फ़लक से गिराया गया मुझे

    मैं नक़्श-ए-हिज्र-ए-यार हूँ शब की फ़सील पर
    जलता हुआ चराग़ बनाया गया मुझे

    लाए हैं रेज़ा रेज़ा किसी आइने के पास
    मेरा ही जिस्म जैसे दिखाया गया मुझे

    पत्थर में जब गुलाब महकते दिखा दिए
    ये मो'जिज़ा नहीं है बताया गया मुझे

    चश्मों के पास हो के भी प्यासा हूँ मैं 'ज़फ़र'
    रेग-ए-रवाँ का रक़्स दिखाया गया मुझे
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    मछलियों का ज़िंदाँ है मर्तबान शीशे का
    देख सात रंगों में ये जहान शीशे का

    साँस ले रहे थे तुम एक ऐसी दुनिया में
    थी ज़मीन पत्थर की आसमान शीशे का

    एक बनते जाते हैं फूल आश्नाई के
    छाँव दे नहीं सकता साएबान शीशे का

    आँसुओं की बारिश में चूर चूर होता है
    आरज़ू बनाती है जो मकान शीशे का

    ज़िंदगी की राहों में आग बन के बिखरा है
    वो जो एक लम्हा था मेरी जान शीशे का

    इस जहाँ में हम शायद फूल की महक में हों
    ये जहाँ 'ज़फ़र' देखा ख़ाक-दान शीशे का
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    जंगल का सन्नाटा मेरा दुश्मन है
    फैलता सहरा दीदा-ओ-दिल का दुश्मन है

    जिस्म की ओट में घात लगाए बैठा है
    मौसम-ए-गुल भी एक अनोखा दुश्मन है

    नक़्श-ए-वफ़ा में रंग वही है देखो तो
    जिस की दुनिया जो दुनिया का दुश्मन है

    साहिल-ए-मर्ग पे रफ़्ता रफ़्ता ले आया
    तन्हाई का रोग भी अच्छा दुश्मन है

    चाँद में शायद प्यार मिलेगा इंसाँ को
    इस बस्ती का साया साया दुश्मन है

    पत्थर तो ख़ामोश पड़े हैं राहों में
    आईना क्यूँ आईने का दुश्मन है

    जिस को दुश्मन समझा वो तो छोड़ गया
    जिस को अपना जाना गहरा दुश्मन है
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    तरस रहा हूँ क़रार-ए-दिल-ओ-नज़र के लिए
    सुकूत-ए-शब में दुआ जिस तरह सहर के लिए

    मैं ख़ाक-ए-राह-गुज़र हूँ कि मसनद-ए-गुल हूँ
    इक इज़्तिराब-ए-मुसलसल है उम्र भर के लिए

    शजर कि जिन से उदासी टपकती रहती है
    ये संग-ए-मील हैं शायद मिरी नज़र के लिए

    जमाल-ए-दोस्त को मशअ'ल बना लिया मैं ने
    वफ़ा कि रख़्त-ए-सफ़र है मिरे सफ़र के लिए

    तिरे ख़याल का ऐवाँ लहू से रौशन है
    मिरी नज़र का उजाला है रहगुज़र के लिए

    शिकस्त जिस से ज़माना लरज़ता रहता है
    वही नवेद-ए-मसर्रत भी है 'ज़फ़र' के लिए
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    फ़लक पे चाँद नहीं कोई अब्र-पारा नहीं
    ये कैसी रात है जिस में कोई सितारा नहीं

    ये इंकिशाफ़ सितारों से भर गया दामन
    किसी ने इतना कहा जब कि वो हमारा नहीं

    ज़मीं भँवर हो जहाँ आसमाँ समुंदर हो
    वहाँ सफ़र किसी साहिल का इस्तिआरा नहीं

    मैं मुख़्तलिफ़ हूँ ज़माने से इस लिए शायद
    किसी ख़याल की गर्दिश मुझे गवारा नहीं

    ख़िज़ाँ के मौसम-ए-ख़ामोश ने सदा दी है
    जमाल-ए-दोस्त ने फिर भी मुझे पुकारा नहीं

    जो रेज़ा रेज़ा नहीं दिल उसे नहीं कहते
    कहें न आईना उस को जो पारा-पारा नहीं

    मैं ज़ख़्म ज़ख़्म सही फिर भी मुस्कुराया हूँ
    'ज़फ़र' ब-नाम-ज़फ़र हार के भी हारा नहीं
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    Ahmad Zafar
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    सियाह रात की हर दिलकशी को भूल गए
    दिए जला के हमीं रौशनी को भूल गए

    किसी कली के तबस्सुम ने बेकली दी है
    कली हँसी तो हम अपनी हँसी को भूल गए

    जहाँ में और रह-ओ-रस्म-ए-आशिक़ी क्या है
    फ़रेब-ख़ुर्दा तिरी बे-रुख़ी को भूल गए

    यही है शेवा-ए-अहल-ए-वफ़ा ज़माने में
    किसी को दिल से लगाया किसी को भूल गए

    ज़रा सी बात पे दामन छुड़ा लिया हम से
    तमाम उम्र की वाबस्तगी को भूल गए

    ख़ुदा-परस्त ख़ुदा से तो लौ लगाते रहे
    ख़ुदा की शान मगर आदमी को भूल गए

    वो जिस के ग़म ने ग़म-ए-ज़िंदगी दिया है 'ज़फ़र'
    उसी के ग़म में ग़म-ए-ज़िंदगी को भूल गए
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    वो फूल जो मुस्कुरा रहा है
    शायद मिरा दिल जला रहा है

    छुप कर कोई देखता है मुझ को
    आँखों में मगर समा रहा है

    मैं चाँद के साथ चल रहा हूँ
    वो मेरी हँसी उड़ा रहा है

    शायद किसी दौर में वफ़ा थी
    ये दौर तो बेवफ़ा रहा है

    सौ रंग हैं ज़िंदगी के लेकिन
    इंसान फ़रेब खा रहा है

    तस्वीर बने तो मुझ से कैसे
    हर नक़्श मुझे मिटा रहा है

    जो लम्हा पयाम है फ़ना का
    चुप-चाप क़रीब आ रहा है

    तूफ़ाँ ने भी आँख खोल दी है
    साहिल भी नज़र बचा रहा है

    फ़नकार कहूँ उसे तो कैसे
    तख़्लीक़ को जो मिटा रहा है

    तक़दीर मिटा चुकी थी जिस को
    तदबीर का राज़ पा रहा है

    आवाज़ से आग लग रही है
    मुतरिब है कि गीत गा रहा है

    एहसास-ए-शिकस्त-ओ-कामरानी
    आईने कई दिखा रहा है

    वो ख़ाक-नशीं 'ज़फ़र' है यारो
    जो सू-ए-फ़लक भी जा रहा है
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    Ahmad Zafar
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    और क्या मेरे लिए अरसा-ए-महशर होगा
    मैं शजर हूँगा तिरे हाथ में पत्थर होगा

    यूँ भी गुज़रेंगी तिरे हिज्र में रातें मेरी
    चाँद भी जैसे मिरे सीने में ख़ंजर होगा

    ज़िंदगी क्या है कई बार ये सोचा मैं ने
    ख़्वाब से पहले किसी ख़्वाब का मंज़र होगा

    हाथ फैलाए हुए शाम जहाँ आएगी
    बंद होता हुआ दरवाज़ा-ए-ख़ावर होगा

    मैं किसी पास के सहरा में बिखर जाऊँगा
    तू किसी दौर के साहिल का समुंदर होगा

    वो मिरा शहर नहीं शहर-ए-ख़मोशाँ की तरह
    जिस में हर शख़्स का मरना ही मुक़द्दर होगा

    कौन डूबेगा किसे पार उतरना है 'ज़फ़र'
    फ़ैसला वक़्त के दरिया में उतर कर होगा
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